Posts

उसके साथ क्या हुआ होगा?

 बरसात की उस रात में स्कूल की पुरानी इमारत किसी भूतिया हवेली जैसी लग रही थी। आसमान में बिजली बार-बार चमक रही थी और हर चमक के साथ सरकारी स्कूल “राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, भीमनगर” की टूटी खिड़कियाँ सफेद रोशनी में कुछ पल के लिए जीवित सी दिखाई देती थीं। गाँव के लोग उस रात जल्दी अपने घरों में बंद हो गए थे। कारण सिर्फ बारिश नहीं था। कारण था — मास्टर दयाशंकर। पूरा गाँव पूछ रहा था — “उसके साथ क्या हुआ होगा?” दयाशंकर पिछले पंद्रह साल से उसी स्कूल में इतिहास पढ़ाते थे। शांत, सख्त और ईमानदार। गाँव के बच्चे उनसे डरते भी थे और सम्मान भी करते थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों से लोग कहते थे कि मास्टरजी बदल गए हैं। वे अक्सर खोए-खोए रहते, रात में स्कूल में देर तक रुकते, और कई बार अकेले ही स्कूल की पिछली बंद पड़ी लाइब्रेरी में जाते देखे जाते। वह लाइब्रेरी वर्षों से बंद थी। कहते हैं, वहाँ कभी स्कूल के पुराने प्रिंसिपल ने आत्महत्या की थी। हालाँकि किसी ने उस घटना को खुलकर कभी स्वीकार नहीं किया। 1 तीन दिन पहले की बात थी। सुबह जब चपरासी रामलाल स्कूल पहुँचा तो उसने देखा कि स्टाफ रूम खुला हुआ है। अंदर कुर्सी...

क्या यह लाश उसी की है?

 क्या यह लाश उसी की है रात का सन्नाटा जैसे पूरे शहर को अपने आगोश में ले चुका था। ठंडी हवा के झोंके वीरान सड़कों से गुजरते हुए एक अजीब-सी सरसराहट पैदा कर रहे थे। शहर के बाहरी इलाके में स्थित पुराना पुल आज भी उतना ही रहस्यमयी था जितना वर्षों पहले हुआ करता था। इंस्पेक्टर अर्जुन अपनी जीप से उतरकर पुल के किनारे खड़ा हो गया। सामने पुलिस की पीली टेप लगी हुई थी और कुछ सिपाही इधर-उधर टॉर्च की रोशनी से जगह को टटोल रहे थे। “सर, लाश यहीं मिली है,” एक कांस्टेबल ने इशारा करते हुए कहा। अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा। जमीन पर एक सफेद चादर से ढकी आकृति पड़ी थी। उसने चादर को थोड़ा सा उठाया—और एक पल के लिए उसकी सांस थम गई। चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। बुरी तरह कुचला हुआ। लेकिन कुछ था… कुछ ऐसा जो उसे अंदर तक हिला गया। “क्या यह…?” उसके होंठों पर शब्द अटक गए। “सर?” कांस्टेबल ने पूछा। अर्जुन ने चादर वापस ढक दी। “पोस्टमॉर्टम के लिए भेजो। और… इस केस को मैं खुद देखूंगा।” उस रात अर्जुन को नींद नहीं आई। बार-बार वही सवाल उसके दिमाग में घूम रहा था— क्या यह लाश उसी की है? 1. अतीत की परछाइयाँ तीन साल पहले… अर्जुन और...

नदी के किनारे का सन्नाटा

 नदी के किनारे का सन्नाटा रात के ठीक 11 बज रहे थे। आसमान में चाँद आधा था और उसकी फीकी रोशनी उस सुनसान नदी पर गिर रही थी, जो शहर से कुछ किलोमीटर दूर बहती थी। नदी के किनारे खड़े पेड़ों की परछाइयाँ पानी में हिल रही थीं, जैसे कोई छुपकर देख रहा हो। राघव अपनी बाइक धीरे-धीरे उस सुनसान रास्ते पर चला रहा था। उसकी आँखों में बेचैनी थी। उसने घड़ी देखी—11:05। “वो यहाँ होगी… उसने यहीं बुलाया था…” उसने खुद से कहा। आज शाम उसे एक अजीब सा मैसेज मिला था—एक अनजान नंबर से: “अगर सच जानना है तो आज रात 11 बजे नदी के किनारे आना… अकेले।” राघव पहले तो डर गया था, लेकिन उसके अंदर एक जिज्ञासा थी—क्योंकि पिछले एक महीने से उसके जीवन में कुछ अजीब घटनाएँ हो रही थीं। पहला संकेत राघव बाइक रोककर नदी के किनारे उतर गया। चारों तरफ सन्नाटा था। बस पानी की हल्की आवाज और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज। तभी उसे कुछ दिखा—एक सफेद दुपट्टा, जो नदी के किनारे एक पत्थर पर पड़ा था। वो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने दुपट्टा उठाया, पीछे से किसी के कदमों की आहट आई। “तुम आ ही गए…” राघव पलटा। एक लड़की खड़ी थी—चेहरा आधा अंधेरे म...

“हवेली का साया”

हवेली का साया राजस्थान के एक छोटे से गाँव ‘भेरूगढ़’ के किनारे एक पुरानी हवेली खड़ी थी—समय की मार से टूटी-फूटी, पर अब भी किसी राजसी अतीत की गवाही देती हुई। गाँव वाले उसे “काली हवेली” कहते थे। कहते हैं, वहाँ रात के सन्नाटे में कोई रोता है… और कभी-कभी कोई छाया खिड़कियों से झाँकती दिखती है। लोग उस रास्ते से भी नहीं गुजरते थे, खासकर सूर्यास्त के बाद। लेकिन आरव… वह अलग था। आरव शहर से आया एक युवा लेखक था, जो डरावनी कहानियाँ लिखता था। उसे ऐसी ही जगहों की तलाश रहती थी—जहाँ रहस्य हो, सन्नाटा हो, और कुछ ऐसा… जो समझ में न आए। गाँव में आते ही उसने उस हवेली के बारे में सुना। “बेटा, उस हवेली से दूर रहना,” बूढ़े मोहनलाल ने चेतावनी दी, “वो जगह ठीक नहीं है। जो भी वहाँ गया… वापस नहीं आया।” आरव मुस्कुराया, “यही तो चाहिए मुझे, काका। एक असली कहानी।” शाम होते-होते आरव अपने बैग के साथ हवेली के सामने खड़ा था। दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था, जैसे किसी ने ज़बरदस्ती खोलने की कोशिश की हो। हवा के झोंके से वह चरमराता हुआ हिल रहा था। जैसे ही आरव अंदर गया, एक अजीब सी ठंडक ने उसे घेर लिया। बाहर गर्मी थी, लेकिन हवेली के भीतर म...

नदी के उस पार का रहस्य

 नदी के उस पार का रहस्य गांव के बाहर बहने वाली वह पुरानी नदी सदियों से शांत दिखाई देती थी, लेकिन उसकी गहराइयों में छुपे रहस्यों की कहानियाँ हर बुज़ुर्ग की ज़ुबान पर थीं। लोग कहते थे कि यह नदी केवल पानी नहीं बहाती, बल्कि अपने साथ कई अधूरी कहानियाँ भी बहाकर ले जाती है। गांव का नाम था रतनपुर। यह छोटा-सा गांव पहाड़ियों और जंगलों से घिरा हुआ था। नदी इसके किनारे पर ऐसे बहती थी जैसे किसी पुराने गीत की धीमी धुन। दिन में यह नदी बेहद सुंदर लगती—चमकती धूप में पानी सोने जैसा झिलमिलाता, लेकिन रात होते ही इसका स्वरूप बदल जाता। गांव के लोग सूरज ढलते ही नदी के किनारे जाने से कतराते थे। खासकर उस पुराने घाट के पास, जिसे “काला घाट” कहा जाता था। यह नाम यूं ही नहीं पड़ा था—कहते हैं, वहां कुछ ऐसा हुआ था जो आज तक किसी को समझ नहीं आया। पुरानी कथा करीब पचास साल पहले की बात है। गांव में एक पंडित जी रहते थे—नाम था शिवराम शास्त्री। वे बहुत विद्वान और शांत स्वभाव के थे। रोज़ सुबह और शाम नदी के घाट पर पूजा करने जाते। एक दिन अचानक गांव में खबर फैली कि शास्त्री जी लापता हो गए हैं। लोगों ने हर जगह खोजा—जंगल, खेत, ...