नदी के किनारे का सन्नाटा

 नदी के किनारे का सन्नाटा

रात के ठीक 11 बज रहे थे। आसमान में चाँद आधा था और उसकी फीकी रोशनी उस सुनसान नदी पर गिर रही थी, जो शहर से कुछ किलोमीटर दूर बहती थी। नदी के किनारे खड़े पेड़ों की परछाइयाँ पानी में हिल रही थीं, जैसे कोई छुपकर देख रहा हो।

राघव अपनी बाइक धीरे-धीरे उस सुनसान रास्ते पर चला रहा था। उसकी आँखों में बेचैनी थी। उसने घड़ी देखी—11:05।

“वो यहाँ होगी… उसने यहीं बुलाया था…” उसने खुद से कहा।

आज शाम उसे एक अजीब सा मैसेज मिला था—एक अनजान नंबर से:

“अगर सच जानना है तो आज रात 11 बजे नदी के किनारे आना… अकेले।”

राघव पहले तो डर गया था, लेकिन उसके अंदर एक जिज्ञासा थी—क्योंकि पिछले एक महीने से उसके जीवन में कुछ अजीब घटनाएँ हो रही थीं।

पहला संकेत

राघव बाइक रोककर नदी के किनारे उतर गया। चारों तरफ सन्नाटा था। बस पानी की हल्की आवाज और दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज।

तभी उसे कुछ दिखा—एक सफेद दुपट्टा, जो नदी के किनारे एक पत्थर पर पड़ा था।

वो धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने दुपट्टा उठाया, पीछे से किसी के कदमों की आहट आई।

“तुम आ ही गए…”

राघव पलटा।

एक लड़की खड़ी थी—चेहरा आधा अंधेरे में छुपा हुआ।

“कौन हो तुम?” राघव ने पूछा।

लड़की मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान अजीब थी।

“तुम्हें सच जानना है ना?”

“कौन सा सच?”

लड़की ने धीरे से कहा—

“उस रात का सच… जब तुमने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था…”

राघव के चेहरे का रंग उड़ गया।

“ये… ये क्या बकवास है? मैं तुम्हें जानता तक नहीं!”

लड़की धीरे-धीरे आगे बढ़ी। चाँदनी उसके चेहरे पर पड़ी।

राघव के हाथ से दुपट्टा गिर गया।

“निशा…?” उसके मुँह से खुद-ब-खुद निकला।

दूसरा सच

निशा… वही लड़की… जो तीन साल पहले अचानक गायब हो गई थी।

वो राघव की कॉलेज फ्रेंड थी। आखिरी बार दोनों इसी नदी के किनारे मिले थे।

और उसके बाद… निशा कभी नहीं मिली।

“तुम… जिंदा हो?” राघव ने काँपती आवाज में पूछा।

निशा हँसी—धीरे, लेकिन डरावनी हँसी।

“क्या सच में तुम्हें लगता है कि मैं जिंदा हूँ?”

राघव पीछे हट गया।

“देखो… मैं कुछ नहीं जानता… उस रात क्या हुआ था… मुझे कुछ याद नहीं…”

“झूठ!”

निशा चीखी। उसकी आवाज नदी के पानी में गूँज उठी।

“तुमने मुझे धक्का दिया था… तुमने मुझे इस नदी में गिरा दिया था…”

राघव का सिर घूमने लगा।

“नहीं… ऐसा नहीं हो सकता…”

तभी अचानक हवा तेज हो गई। पेड़ों की शाखाएँ जोर से हिलने लगीं।

निशा धीरे-धीरे उसके पास आई और फुसफुसाई—

“आज तुम्हें सब याद आएगा…”

तीसरा रहस्य — यादों का दरवाज़ा

राघव की आँखों के सामने अचानक सब कुछ धुंधला होने लगा।

उसे याद आने लगा—

तीन साल पहले की वही रात…

वो और निशा यहाँ आए थे।

निशा बहुत घबराई हुई थी।

“राघव, मुझे किसी ने धमकी दी है… अगर मैंने सच बताया तो वो मुझे मार देंगे…”

“कौन?” राघव ने पूछा था।

निशा ने कहा था—

“तुम्हारा दोस्त… अजय…”

राघव चौंक गया था।

“क्या बकवास कर रही हो?”

“मैंने उसे देखा है… वो इस नदी के किनारे किसी को मारकर फेंक रहा था…”

राघव गुस्से में आ गया था।

“तुम पागल हो गई हो!”

निशा ने उसका हाथ पकड़ा—

“मुझ पर भरोसा करो…”

तभी पीछे से किसी की आवाज आई—

“तुम्हें इतना कुछ नहीं जानना चाहिए था…”

दोनों ने मुड़कर देखा—

अजय खड़ा था।

चौथा मोड़

“अजय… तुम यहाँ?” राघव ने पूछा।

अजय मुस्कुराया—

“हाँ… और अब ये लड़की ज्यादा दिन नहीं जिएगी…”

राघव घबरा गया।

“ये क्या कह रहे हो?”

अजय ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए—

“इसने मुझे देख लिया है… अब ये जिंदा नहीं रह सकती…”

निशा पीछे हटने लगी।

“राघव… प्लीज कुछ करो…”

राघव के अंदर डर और गुस्सा दोनों था।

अजय ने अचानक निशा की तरफ झपट्टा मारा।

निशा चिल्लाई—

“बचाओ!”

राघव ने अजय को पकड़ने की कोशिश की।

तीनों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई।

और फिर…

एक पल ऐसा आया—

जब निशा का पैर फिसला…

और वो सीधे नदी में गिर गई।

“निशा!!!” राघव चिल्लाया।

पाँचवां सच

राघव की आँखें खुल गईं।

वो फिर से उसी नदी किनारे खड़ा था।

सामने निशा खड़ी थी।

“अब याद आया?” उसने पूछा।

राघव रो पड़ा।

“मैंने तुम्हें नहीं धक्का दिया था… वो हादसा था…”

निशा की आँखें गुस्से से भर गईं।

“लेकिन तुमने मुझे बचाया भी नहीं…”

राघव चुप हो गया।

उसकी चुप्पी ही जवाब थी।

“तुम डर गए थे…” निशा बोली।

“हाँ… मैं डर गया था…” राघव ने सिर झुका लिया।

“और तुम भाग गए…” निशा की आवाज ठंडी हो गई।

छठा मोड़ — असली खलनायक

तभी पीछे से एक आवाज आई—

“और मैं अब भी यहाँ हूँ…”

राघव और निशा दोनों ने मुड़कर देखा।

अजय।

लेकिन इस बार… वो पहले जैसा नहीं था।

उसकी आँखें खाली थीं… जैसे कोई आत्मा।

“तुम…?” राघव ने हकलाते हुए कहा।

अजय हँसा—

“हाँ… मैं… लेकिन अब मैं वो नहीं हूँ जो पहले था…”

निशा ने कहा—

“तुम भी मर चुके हो…”

राघव सन्न रह गया।

“क्या?”

अजय बोला—

“उस रात के बाद… मैंने तुम्हें ढूँढने की कोशिश की… लेकिन पुलिस मेरे पीछे थी… मैंने भागते-भागते इसी नदी में छलांग लगा दी…”

सातवां रहस्य — तीनों की कहानी

अब वहाँ तीन लोग थे—

या शायद तीन आत्माएँ…

निशा बोली—

“हम दोनों मर चुके हैं… लेकिन तुम जिंदा हो राघव…”

अजय हँसा—

“अभी तक…”

राघव डर गया।

“तुम लोग क्या चाहते हो?”

निशा ने कहा—

“सच…”

अजय ने कहा—

“और न्याय…”

आठवां क्लाइमेक्स

अचानक नदी का पानी तेज़ होने लगा।

हवा में ठंडक बढ़ गई।

निशा ने राघव का हाथ पकड़ा—

“तुम्हें सच बताना होगा… पुलिस को… दुनिया को…”

अजय ने गुस्से से कहा—

“और फिर… तुम हमारे पास आ जाओगे…”

राघव ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की—

लेकिन अब वो हिल नहीं पा रहा था।

जैसे किसी ने उसे जकड़ लिया हो।

“नहीं… मैं मरना नहीं चाहता…”

निशा की आँखों में आँसू आ गए—

“मैं भी नहीं चाहती थी…”

अंतिम मोड़

अचानक सब शांत हो गया।

राघव जमीन पर गिर पड़ा।

सुबह हो चुकी थी।

कुछ लोग वहाँ इकट्ठा थे।

“अरे… ये तो राघव है!”

“ये यहाँ कैसे?”

राघव ने आँखें खोलीं।

सब कुछ जैसे सपना था।

लेकिन उसके हाथ में वही सफेद दुपट्टा था।

अंत — लेकिन क्या सच में?

एक हफ्ते बाद—

राघव ने पुलिस के सामने सब सच बता दिया।

अजय के पुराने केस फिर से खुले।

नदी के किनारे खुदाई हुई।

और वहाँ से दो कंकाल मिले।

निशा… और अजय।

राघव अब अकेला था।

लेकिन हर रात…

उसे वही आवाज सुनाई देती—

“हम अभी भी यहीं हैं…”

और नदी के किनारे…

आज भी…

कभी-कभी…

तीन परछाइयाँ दिखाई देती हैं।

समाप्त… या शायद नहीं।

Comments

Popular posts from this blog

“हवेली का साया”

नदी के उस पार का रहस्य